सोशल मीडिया से बच्चों में ईटिंग डिसऑर्डर

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ईटिंग डिसऑर्डर एक बीमारी जैसी स्तिथि है जब खाने की आदतें अनियमित हो जाती है और अपने शरीर के वजन, आकर को लेकर चिंता बनी रहती है।

सोशल मीडिया से बच्चों में ईटिंग डिसऑर्डर
सोशल मीडिया से बच्चों में ईटिंग डिसऑर्डर

खाने की आदतों में अनियमितता से मतलब है आवश्यकता से कम या ज्यादा खाना खाना और खाने की चीज़ों की पूरी समझ न होना , जिससे की खुद के शरीर को नुकसान हो। यह डिसऑर्डर महिलाओं और पुरुष दोनों के साथ देखा जा सकता है।

युवा बच्चे जो सोशल मीडिया पर बहुत ज्यादा सक्रिय उनमें ईटिंग डिसऑर्डर की शिकायत देखा गया है। 13 -14 साल से ही बच्चे फेसबुक , इंस्टाग्राम , व्हाट्सप्प जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स में सक्रिय रहने लगे है और इनके प्रभाव से बचना अब नामुमकिन सा हो गया है।

इनसे प्रभावित होकर वे वजन कम करना या अपने शरीर को अच्छे आकार में लाने के लिए ऐसे प्रयास में लग जाते है जो उनके लिए स्वस्थ नहीं होता। ऐसे बच्चे जो सोशल मीडिया पर अपना ज्यादातर वक़्त बिताते है उन्हें ईटिंग डिसऑर्डर होने कि संभावन दुगुना है।

सोशल मीडिया एक व्यक्ति के खाने के आदत और मोटापा होने के डर को प्रभावित करता है। परफेक्ट बॉडी , रेस्टोरेंट में खाना, जीम और एक्सरसाइज (exercise) जैसे चीज़ों के पीछे ही सोशल मीडिया दुनिया के लोग भाग रहे है।

ऐसे युवा जिनको ईटिंग डिसऑर्डर की शिकायत है वे इन सब विषयों में लगातार हो रहे पोस्ट हो को देखकर तनाव और चिंतन ग्रशित होते है। कैसा डाइट (diet) लेना चाहिए, बॉडी/शरीर (body) का आकार कैसा होना चाहिए और यह सब करके लोग कैसे खुशहाल होकर ज़िन्दगी जी रहे है जैसे विषयों पर सोशल मीडिया में भर भर के जानकारी उपलब्ध है।

सोशल मीडिया ही ईटिंग डिसऑर्डर होने का एकमात्र कारण नहीं है। लेकिन यह एक व्यक्ति का अपने शरीर के प्रति असंतोष और आत्मविश्वास को प्रभावित करता है। लोग लगातार अपने आप को परफेक्ट बॉडी वाले मॉडल्स के साथ तुलना करते है और फिर अपने आप में कमी देखने लगते है।

जैसे जैसे सोशल मीडिया यूज़ करने वाले बढ़ रहे है वैसे वैसे परफेक्ट बॉडी रखने के दबाव से बचना लोगों के लिए मुश्किल हो गया है। यह लोगों के हर दिन कि जिंदगी से इतना जुड़ चुका है कि लोग उनके राय के बारे में सोचते है जिनसे वे कभी मिले ही नहीं है।

लोगों द्वारा किया गया नाकारात्मक कमैंट्स / टिप्पणी , एक व्यक्ति को शारीरिक और मानसिक रूप से प्रभावित करता है। अब तो हमारे फोटोज (photos) को और भी आकर्षक बनाने के लिए हर फ़ोन में तरह तरह के फ़िल्टर आ गए है। लोग अपने ज़िन्दगी में घट रही हर छोटी बड़ी घटनाओं को शेयर करके खुश हो जाने का एक नकली उम्मीद बनाये बैठे है।

अब सवाल ये आता है कि हम ऑनलाइन कैसे सुरक्षित बचे रह सकते है। सबसे जरुरी है कि हम सोशल मीडिया के प्रति जागरूक और सावधान रहे। समझने कि कोशिश करें कि ये परफेक्ट लेकिन एडिट (edit) किये हुए पोस्ट्स किस लिए है। ऐसे एप्पस और वेबसाइट को लिमिट से यूज़ करें, देखें की इन सब में आपका कीमती वक्त ख़राब ना हो रहा हो।

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