साइकोलॉजी : क्या आप कोई फैसला करने से पहले बहुत सोचते हैं

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क्या मुझे 8000 तक का मोबाइल लेना चाहिए या 15000 तक का ? वेब सीरीज का लास्ट एपिसोड देख लूँ या थोड़ा पढाई कर लूँ ? क्या आज डिनर करने बहार चले जाएँ ? बहुत से लोगों को ऐसे छोटे छोटे फैसले लेने में परेशानी होती है। ऐसे परेशानी तब होती है फैसला लेना आसान होता है लेकिन हमारे पास विकल्प बहुत होते हैं। लोगों के इस प्रकार के साइकोलॉजी के बारे में डिटेल में निचे पढ़ते है।

साइकोलॉजी : क्या आप कोई  फैसला करने से पहले बहुत सोचते हैं
साइकोलॉजी : क्या आप कोई फैसला करने से पहले बहुत सोचते हैं

इसे अमेरिका के वेंचर कैपिटलिस्ट पैट्रिक मक्गिन्निस (Patrick McGinnis) फ़ोबो – फियर ऑफ़ बेटर ऑप्शन (Fobo: Fear of better option) कहते है। जिसे हम हिंदी में अच्छे विकल्प न पाने की डर कह सकते हैं। फ़ोबो कभी भी हो सकता है , छोटा फैसल जैसे क्या पहनुं , टीवी पर क्या देखूं से लेकर बड़े फैसले जैसे नौकरी करूँ या अपना पैसन फॉलो करूँ। कुछ लोग इसे एनालिसिस पैरालिसिस (विश्लेषण न कर पाना )भी कहते है।

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फ़ोबो का उदहारण जो आपके साथ भी होता होगा

इसे आसान तरीके से समझने के लिए एक उदहारण हो सकता है कि वीकेंड या छुटियों पर क्या करें। दोस्तों के साथ हैंग आउट कर सकते हैं जिसमें की मजा ही आएगा लेकिन फिर एक पार्टी का इनविटेशन भी है जहाँ और ज्यादा मजा आ सकता है या फिर फेसबुक वाली फ्रेंड के साथ डेट पे चले जाऊं। ऐसे लोग जिनको फ़ोबो की शिकायत है उन्हें यह सब फैसले लेने में दिक्कत होगी।

कॉलेज स्टूडेंट्स की हर दिन की मुश्किलें

24 साल की औएफे ओडोनगुए “द गार्डियन” (The Guardian )को बताती हैं कि वो हमेशा छोटे फैसले ही होते जिसे लेने में मुश्किल और ज्यादा वक्त लगता है। वो यूनिवर्सिटी का एक घटना बताती है कि वो हमेशा कंफ्यूज रहती है की पढ़ने के लिए कहाँ जाऊं – लाइब्रेरी या कैफ़े? फिर शोचतीं है कि क्या मैं एक जगह रहकर काम कर पाऊँगी ? क्या मुझे चाय या कॉफी चहिते ? वहां पर पर्याप्त सीटें तो होंगी ना ? यह सब फैसला करते करते उनका पेट दर्द शुरू हो जाता है। आखिर में वो देखती है की यह सब छोटे छोटे फैसले अंत में कोई मायने भी नहीं रखते।

पैट्रिक , जो फोमो (Fomo: Fear of missing out हिंदी में कुछ खोने का डर ) और फ़ोबो पर रिसर्च कर रहे हैं , बताते हैं की फ़ोबो लोगों का कोई नया आदत नहीं है। ऐसा महसूस करना बताता है कि हम कौन हैं। ऐसा होता है क्यूंकि हम सभी को हमेशा सर्वोत्तम चीज़ ही चाहिए।

लेकिन जब से टेक्नोलॉजी आई हैं इंटरनेट ने फोमो और फ़ोबो को समाज में एक साधारण व्यवहार बना दिया है। क्यूंकि आजकल हम आसानी से अपने आप को एक दूसरे के साथ तुलना कर सकते हैं।

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ऑनलाइन शॉपिंग करते वक़्त फ़ोबो

पैट्रिक बताने हैं की अगर हम एक जूता खरीदने किसी ऑनलाइन स्टोर पर जातें हैं तो हमारे पास 200 से ज्यादा विकल्प होते हैं लेकिन 50 साल पहले हमको सिर्फ दो या तीन किस्मों से पसंद करना होता था। वो कहतें है कि फ़ोबो की परेशानी अमीरों में ज्यादा होती हैं क्यूंकि उनके पास विकल्प बहुत होते हैं।

पैट्रिक ने खुद फोमो और फ़ोबो की परेशानी झेली हैं जब उन्होंने 15 साल पहले हार्वर्ड बिज़नेस स्कूल (Harvard Business School )में यह दोनों शब्दों को बनाया था।

लेकिन औएफे ओडोनगुए इसके बारे में ज्यादा नहीं सोचतीं। उनका मानना है की यह उनके व्यक्तित्व का एक हिस्सा है और वक्त के साथ आपके दोस्त भी इसी तरह आपको स्वीकार करने लगते हैं।

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